मध्य प्रदेश की संयुक्ता बनर्जी ने तोड़ा सामाजिक बन्दिशों को, 8 साल बाद बनी है सिंगल मदर

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हमारे समाज में लड़कियों को हमेशा से ही बहुत कम आंका जाता है. इस सोच को बदलने के लिए देशभर में काफी प्रयास होते रहते हैं, और वहीं कुछ हद तक यह प्रयास सफल भी हुए हैं, चाहे वह महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने वाली ज्योतिबा बाई फुले हों, या एवरेस्ट चढ़ने वाली कल्पना चावला, यह महिलाएं हमेशा ही अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनी है, और उन लोगों के लिए गहरा सबक जो कहते हैं कि पुरुषों से महिलाएं कमजोर होती हैं.

कई बार देखा जाता है कि महिलाओं को अपने जीवन से जुड़े हुए फैसले लेने में भी सक्षम नहीं समझा जाता हैं, उन फैसलों पर भी उनके घर वालों या रिश्तेदारों का अधिकार होता है, चाहे वह शिक्षा को लेकर फैसला लेना हो या शादी को लेकर फैसला लेना हो, यह सब हमारे देश में घरवाले ही तय करते हैं. समाज में ऐसी बंदिशों से निकलने के लिए लड़कियां तमाम कोशिश करती हैं और कहीं हद तक वो इन कोशिशों में सफल भी हो हैं. ऐसी ही तमाम बंदिशों से निकलकर लड़कियों के लिए प्रेरणा बनी है मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वाली संयुक्ता बनर्जी, संयुक्ता ने अपने परिवार से अलग अपनी जिंदगी को जीने के लिए एक अलग नायाब रास्ता चुना है.

 

वर्तमान समय में संयुक्ता एक सिंगल मदर है. और वह अपने पति से कई साल पहले अलग हो चुकी हैं. लेकिन उनका यह फैसला सिंगल मदर बनने का कितना सही है इस बात को उन्होंने विस्तार से एक इंटरव्यू में बताया, जब उनसे सवाल पूछा गया कि आपने एडॉप्शन के लिए कितने साल का इंतजार किया और आपको परेशानी कहां आ रही थी.

इसका जवाब देते हुए संयुक्ता कहते हैं कि मैं एडॉप्शन की तैयारी पिछले काफी समय से कर रही थी मैंने तय कर लिया था कि मैं किसी बच्चे को अडॉप्ट करूंगी चाहे वह लड़की हो या लड़का, इसके लिए सबसे पहले मैंने अपनी इकोनॉमिकल कंडीशन को ठीक किया और बैंक बैलेंस को मैनेज किया, ताकि इसमें कोई दिक्कत ना आ सके, बच्चे को अडॉप्ट करने के कुछ रूल और रेगुलेशन होते हैं जिनको मैंने बखूबी निभाया और सबसे पहले cara यानि central adoption resource athourity में रजिस्ट्रेशन करवाया. उसके बाद मेरी एक ही शर्त थी कि जो भी बच्चा मुझे मिले वह मेडिकली एकदम फिट होना चाहिए, और आगे में उसकी पूरी जिम्मेदारी से देखभाल करूंगी.

जब इंटरव्यूर ने संयुक्ता से दूसरा सवाल पूछा कि इस फैसले को समाज में एक बोल्ड फैसले के रूप में देखा जाता है इस पर आप क्या सोचती हैं? इस पर संयुक्ता ने जवाब देते हुए कहा कि जब मेरे पास cara से कॉल आया कि आपका रजिस्ट्रेशन कैंसिल हो रहा है, यह सुनते ही मुझे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा इतनी मेहनत के बावजूद भी मैं बच्चे को एडॉप्ट करने के लिए सक्षम नहीं थी, लेकिन बाद में जब मैंने अपने डॉक्टर से सलाह ली तो उन्होंने मुझे आई वी एफ, आईसीआई जैसी तकनीकों के बारे में विस्तार से समझाया जिसके बाद मैंने आईसीआई तकनीक को चुना.

हालांकि जब मैंने इस डिसीजन लिया तो मेरे दिमाग में सामाजिक बंदिशों का भी ख्याल आया लेकिन मैं जानती थी यह लीगल तरीके से भी हो सकता है, और मैंने सामाजिक सोच पर ध्यान ना देते हुए अपने काम को जारी रखा और 8 महीने बाद मेरे एक बेटे ने जन्म लिया. आगे संयुक्ता ने कहा कि इस दौरान मुझे काफी तारीफ और ताने सुनने पड़े, काफी नेगेटिव कमेंट मेरी पर्सनैलिटी पर किए गए, मुझे मेरे परिवार और दोस्तों का सपोर्ट भी मिला, और जब मैं बेड रेस्ट पर थी तो मेरी 70 साल की मां ने भी मेरी खूब मदद की. संयुक्ता ने उन लड़कियों के सवालों का भी जवाब भी दिया जो इन सवालों से डरती हैं, संयुक्ता ने कहा कि आप कोई भी फैसला लें सबसे पहले उसके पॉजिटिव और नेगेटिव पॉइंट को अच्छी तरह से पढ़ लें.

उसके बाद सभी सामाजिक लोगों की राय ले फिर उसके बाद डिसाइड करें कि आप जो फैसला ले रहीं हैं वह कितने हद तक सही है. कोई भी फैसला लेने के लिए समाज को मजबूत नहीं होना होगा ब्लकि आपको मजबूत होना होगा. जब संयुक्ता से आगे पूछा गया कि आपको अपने परिवार की वजह से कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा, इस पर संयुक्ता ने जवाब देते हुए कहा कि मुझे मेरे परिवार ने इस दौरान काफी सपोर्ट किया और मेरे 8 भाई बहनों ने भी इस डिसीजन का समर्थन किया, वहीं मेरी मां ने भी जब यह डिसीजन सुना तो वह नेगेटिव नहीं हुई बल्कि उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया. संयुक्त से जब अगला सवाल पूछा गया कि आप एडॉप्शन और आईवीएफ प्रोसेस के बारे में लड़कियों को समझा सकती हैं. जो इस सवाल को लेकर संदेह में बनी रहती हैं. इस पर …

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