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100 रुपये की मजदूरी कर बेटे को बनाया आईएएस, रहती थी झोपड़ी में

हरिवंश राय बच्चन का ये कविता “मंजिल उन्ही को मिलती है जिनके सपनो में जान होती है, पंखों से कुछ नही होता हौसलो से उड़ान होती है” आपने तो जरूर ही सुना होगा, लेकिन इन शब्दो को सच कर दिखाया है महाराष्ट्र के धुले जिले के रहने वाले डॉ. राजेन्द्र भरुद ने। 7 जनवरी 1988 को सकरी तालुका गाँव के आदिवासी भील समुदाय में जन्मे डॉ. राजेन्द भरुद जब अपनी माँ गर्भ में थे तभी इनके पिता का मृत्यु हो गया। ऐसे में घर-परिवार का भरण पोषण का बोझ इनके माँऔर दादी पर आ गया। इसके लिए इनकी मा घर पे ही देशी शराब का कारोबार करने लगी। आदिवासी समुदाय में देशी शराब को अवैध करार नही दिया जाता है।

डॉ. राजेन्द्र बताते है की उनके “घर के हालात ऐसे थे के मृत पिता के फ़ोटो के लिए भी पैसे नही थे। उनका परिवार गन्ने के पत्तो से बना एक छोटी झोपड़ी में रहता था। उनके गाँवमें शिक्षा का इस कदर अभाव था के कोई इसका जरा भी महत्व नही समझता था। जिसके पास जितना था वो उतने में ही खुश था। एक दिन में औसतन 100 रुपये की आमदनी होती थी जिस से उनका कारोबार और घर का सारा खर्च भी चलता था। डॉ. राजेन्द्र 3 भाई-बहन थे। वो और उनकी बहन गांव के ही जिला परिषद स्कूल से शिक्षा प्राप्त किया जबकि उनका एक भी ने आदिवासी स्कूल से।

डॉ राजेन्द्र बचपन से ही पढ़ाई में बहुत होनहार थे, जब वो कक्षा 5 में थे तब स्कूल के शिक्षकों ने उनके माँ को अच्छे स्कूल में दाखिले के लिए सुझाव दिया तब जा कर उनकी मा ने गाँव से 150KM दूर नवोदय स्कूल में दाखिलाकरवा दिया। इनके त्रीव बुद्धि को देखते हुए उनके शुरू से ही स्कॉलरशिप मिला जो इनके पढ़ाई में बहुत ही ज्यादा मददगार साबित हुआ। 10वी कक्षा में बहुत ही अच्छे मार्क्स से उतीर्ण हुए और 12वी में उन्होंने अपने क्लास में रैंक 1 से पास हुए। परिणाम स्वरूप उनको मेरिट स्कॉलरशिपमिला और मुम्बई के सेंट जीएस मेडिकल कॉलेज में दाखिल मिल गया। वहाँ पे इन्होंने UPSC की तैयारी प्रारम्भ किया। मेडिकल पढ़ाई के आखिरी सालो में वो MBBS के साथ उन्होंने UPSC की परीक्षा दिया और पहले ही कोशिश में उन्हें सफलता प्राप्त हुआ। जब वो अपनी मा को बताये के वो अब कलेक्टर बनने जा रहे रहे है तो ये बात उनकी मा को समझ नही आया और न गांव वालो को। बाद में जब गांव वालो को ये पदकी गरिमा समझ आया तोह वो खुशी से झूम उठे और उन्हें बहुत बधाई दी।

चयनित होने के बाद डॉ. राजेन्द्र का मसूरी में ट्रेनिंग हुआ और वर्ष 2015 में वो नादेड़ जिले में पोस्टिंग हुआ।

वर्ष 2014 में उन्होंने ने मराठी भाषा में अपने संघर्ष और जीवन यात्रा पे एक किताब लिखा। “स्वपन पाहिल” नामक इस किताब में उन्होंने अपने बलिदान का जिक्र किया है।

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